IRES 2026 के दूसरे दिन उमड़ा छात्रों और अभिभावकों का उत्साह, रूसी विश्वविद्यालयों ने पेश किए वैश्विक शिक्षा के अवसर

नई दिल्ली, भारत : द्वितीय इंडो-रशियन एजुकेशन समिट 2026 (IRES 2026) के दूसरे दिन छात्रों, अभिभावकों, शिक्षकों और अकादमिक काउंसलर्स की उल्लेखनीय भागीदारी देखने को मिली। समिट के दौरान प्रतिभागियों को प्रमुख रूसी विश्वविद्यालयों और अंतरराष्ट्रीय शिक्षा के अवसरों से सीधे जुड़ने का अवसर प्रदान किया गया।रूस एजुकेशन द्वारा Rossotrudnichestvo, भारत में रूसी संघ के दूतावास तथा रूसी हाउस, नई दिल्ली के सहयोग से आयोजित इस समिट के दूसरे दिन का मुख्य उद्देश्य छात्रों को रूसी विश्वविद्यालयों, अकादमिक विशेषज्ञों और शिक्षा जगत के नेताओं से जोड़ना था।कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण “रूसी विश्वविद्यालय प्रदर्शनी” रही, जिसमें 100 से अधिक विश्वविद्यालयों और 200 से अधिक विश्वविद्यालय प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस प्रदर्शनी ने छात्रों और अभिभावकों को विश्वविद्यालय प्रतिनिधियों से सीधे संवाद करने तथा शैक्षणिक पाठ्यक्रमों, प्रवेश प्रक्रिया, छात्रवृत्ति, आवास सुविधाओं, वीज़ा सहायता, छात्र जीवन और भविष्य के करियर अवसरों की विस्तृत जानकारी प्राप्त करने का मंच प्रदान किया।प्रदर्शनी में मेडिसिन, डेंटिस्ट्री, इंजीनियरिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, एविएशन, सूचना प्रौद्योगिकी, मैनेजमेंट, कृषि, वेटरिनरी साइंसेज, बायोटेक्नोलॉजी, ह्यूमैनिटीज, इंटरनेशनल रिलेशंस और रूसी भाषा अध्ययन जैसे विभिन्न क्षेत्रों में उपलब्ध अवसरों को प्रदर्शित किया गया।पूरे दिन के दौरान 1,500 से अधिक छात्रों और अभिभावकों ने विश्वविद्यालय प्रतिनिधियों और शिक्षा विशेषज्ञों के साथ व्यक्तिगत काउंसलिंग सत्रों और इंटरैक्टिव चर्चाओं में भाग लिया। इन चर्चाओं के माध्यम से छात्रों को विभिन्न विश्वविद्यालयों की तुलना करने, पात्रता मानदंड समझने, छात्रवृत्ति के अवसरों की जानकारी प्राप्त करने और अपने शैक्षणिक भविष्य के लिए व्यक्तिगत मार्गदर्शन प्राप्त करने का अवसर मिला। प्रतिभागियों की उत्साहपूर्ण भागीदारी ने रूस में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के प्रति बढ़ती रुचि को दर्शाया।अभिभावकों ने भी विश्वविद्यालय प्रतिनिधियों से सक्रिय रूप से संवाद कर छात्र सहायता सेवाओं, कैंपस सुविधाओं, आवास व्यवस्था, सुरक्षा उपायों और अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए उपलब्ध करियर अवसरों के बारे में जानकारी प्राप्त की। समिट के दौरान बड़ी संख्या में छात्रों ने प्रमुख रूसी विश्वविद्यालयों में प्रवेश प्रक्रियाएँ प्रारंभ एवं पूर्ण कीं, जिससे यह कार्यक्रम शैक्षणिक निर्णय और भविष्य के अवसरों के लिए अत्यंत उपयोगी मंच साबित हुआ।छात्र सहभागिता के अलावा, समिट ने भारतीय और रूसी शैक्षणिक संस्थानों के बीच सहयोग को मजबूत करने हेतु संस्थागत चर्चाओं और अकादमिक संवाद को भी बढ़ावा दिया। प्रतिनिधियों ने अकादमिक एक्सचेंज, रिसर्च सहयोग, छात्र गतिशीलता और भविष्य की शैक्षणिक साझेदारियों पर विचार-विमर्श किया।समिट के महत्व पर प्रकाश डालते हुए रूस एजुकेशन के टेक्निकल एडवाइज़र एयर मार्शल (डॉ.) पवन कपूर (सेवानिवृत्त) ने कहा कि भारत और रूस के बीच 70 वर्षों से अधिक समय से विश्वासपूर्ण साझेदारी रही है, जो रक्षा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग पर आधारित है। उन्होंने कहा कि शैक्षणिक सहयोग छात्रों के लिए सार्थक अवसर उत्पन्न कर रहा है और यह द्विपक्षीय संबंधों के सबसे मजबूत स्तंभों में से एक है।भारत में Rossotrudnichestvo के प्रतिनिधि कार्यालय की प्रमुख डॉ. एलेना रेमिज़ोवा ने समिट में भाग लेने वाले भारतीय और रूसी विश्वविद्यालयों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने भारत और रूस के बीच मजबूत सांस्कृतिक और शैक्षणिक संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि रूस भारतीय छात्रों के लिए विविध शैक्षणिक और शोध अवसर उपलब्ध कराता है। उन्होंने कहा कि IRES जैसी पहलें शैक्षणिक सहयोग को मजबूत करने के साथ-साथ छात्रों के विकास, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और अंतरराष्ट्रीय करियर के नए मार्ग भी प्रशस्त करती हैं। मारी स्टेट यूनिवर्सिटी के रेक्टर प्रो. मिखाइल एन. श्वेत्सोव ने कहा कि रूसी विश्वविद्यालय भारतीय छात्रों का स्वागत गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक अवसंरचना, शोध अवसरों और सहयोगपूर्ण शिक्षण वातावरण के माध्यम से लगातार कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इंडो-रशियन एजुकेशन समिट जैसी पहलें छात्रों को विश्वविद्यालयों से सीधे जोड़ती हैं और उन्हें अपने शैक्षणिक भविष्य के संबंध में सूचित निर्णय लेने में सहायता करती हैं।समिट के दूसरे दिन ने छात्र-विश्वविद्यालय संवाद के महत्व को पुनः स्थापित किया और अंतरराष्ट्रीय शिक्षा के अवसरों की बढ़ती मांग को उजागर किया। छात्रों, अभिभावकों, विश्वविद्यालयों और शिक्षा विशेषज्ञों को एक मंच पर लाकर IRES 2026 ने शैक्षणिक खोज, सूचित निर्णय और सार्थक अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिए एक सशक्त वातावरण तैयार किया।रूस एजुकेशन भारत की विश्वसनीय शिक्षा परामर्श संस्थाओं में से एक है, जिसके पास रूसी संघ में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के इच्छुक छात्रों का मार्गदर्शन करने का 33 वर्षों से अधिक का अनुभव है। विश्वविद्यालय साझेदारियों, प्रवेश मार्गदर्शन, छात्र सहायता सेवाओं और विभिन्न अकादमिक पहलों के माध्यम से रूस एजुकेशन गुणवत्तापूर्ण अंतरराष्ट्रीय शिक्षा को बढ़ावा देने और भारत-रूस शैक्षणिक सहयोग को मजबूत करने के लिए निरंतर कार्य कर रहा है।

अवधूत परम्परा : सेवा, करुणा और मानव गरिमा का जीवंत संदेश

नई दिल्ली: भारतीय सनातन परम्परा में “अवधूत” धारा आध्यात्मिक साधना, करुणा और निःस्वार्थ सेवा का अद्वितीय संगम मानी जाती है। यह परम्परा केवल व्यक्तिगत मोक्ष या साधना तक सीमित नहीं रही, बल्कि समाज के उपेक्षित, पीड़ित और वंचित वर्गों को सम्मानपूर्ण जीवन प्रदान करने के लिए समर्पित रही है। अवधूत परम्परा का उद्भव भगवान दत्तात्रेय की अद्वैत चेतना से माना जाता है, जिसे आगे बाबा कीनाराम ने अघोर दर्शन के माध्यम से सामाजिक चेतना से जोड़ा। बाद में अवधूत भगवान राम ने इसे व्यापक मानव सेवा आन्दोलन का स्वरूप प्रदान किया। आज यह परम्परा उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, ओडिशा और छत्तीसगढ़ सहित अनेक राज्यों में स्वास्थ्य, शिक्षा, कुष्ठ सेवा, आदिवासी उत्थान और मानव गरिमा की रक्षा के लिए सक्रिय रूप से कार्य कर रही है। “अवधूत” का अर्थ है ऐसा साधक जिसने मोह, भय, घृणा, लोभ और सामाजिक भेदभाव का त्याग कर दिया हो। इस परम्परा का मूल संदेश है — “मानव सेवा ही ईश्वर सेवा है।” अवधूत साधक सम्पूर्ण सृष्टि को एक परिवार मानता है और हर प्राणी में परमात्मा का स्वरूप देखता है। इस परम्परा के दार्शनिक आधार में भगवान दत्तात्रेय का विशेष स्थान है, जिन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश का संयुक्त स्वरूप माना जाता है। उन्होंने यह शिक्षा दी कि वास्तविक ज्ञान केवल ग्रंथों से नहीं, बल्कि जीवन, प्रकृति और अनुभवों से प्राप्त होता है। 20वीं शताब्दी में अवधूत भगवान राम ने इस परम्परा को नई दिशा देते हुए आध्यात्मिकता को प्रत्यक्ष मानव सेवा से जोड़ा। उन्होंने विशेष रूप से कुष्ठ रोगियों, आदिवासियों, दलितों और समाज से बहिष्कृत वर्गों के बीच कार्य किया। उस समय कुष्ठ रोगियों को सामाजिक बहिष्कार और अपमान का सामना करना पड़ता था, लेकिन अवधूत भगवान राम ने उन्हें अपनाकर मानवता और करुणा का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया। वाराणसी स्थित “अवधूत भगवान राम कुष्ठ सेवा आश्रम” इस सेवा भावना का विश्वस्तरीय उदाहरण है। गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज जानकारी के अनुसार, आश्रम ने 99,045 पूर्ण कुष्ठ रोगियों तथा 1,47,503 आंशिक कुष्ठ रोगियों का उपचार कर मानव सेवा का ऐतिहासिक कार्य किया है। आश्रम की विशेषता केवल चिकित्सा सेवा तक सीमित नहीं रही, बल्कि रोगियों को सम्मान, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता से जोड़ने में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। भोजन, वस्त्र, आश्रय और उपचार के साथ सामुदायिक जीवन, श्रम, प्रार्थना और ध्यान के माध्यम से रोगियों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ा गया। अवधूत परम्परा की सेवा गतिविधियाँ वाराणसी तक सीमित नहीं हैं। बिहार, मध्य प्रदेश, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के दूरस्थ एवं आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य शिविर, निःशुल्क दवा वितरण, शिक्षा, छात्रावास और संस्कार केन्द्रों के माध्यम से हजारों लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाया गया है। आज जब समाज भौतिक प्रगति के बावजूद संवेदनहीनता, अकेलेपन और विभाजन जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब अवधूत परम्परा का संदेश अत्यंत प्रासंगिक हो उठता है। यह परम्परा हमें याद दिलाती है कि वास्तविक आध्यात्मिकता केवल पूजा-पाठ में नहीं, बल्कि पीड़ित मानवता के जीवन में सम्मान, आशा और आत्मविश्वास जगाने में निहित है। भगवान दत्तात्रेय से बाबा कीनाराम, अवधूत भगवान राम और परमपूज्य श्री प्रियदर्शी राम तक प्रवाहित यह करुणामयी धारा भारतीय संस्कृति की जीवंत आत्मा है, जो आज भी समाज को मानव सेवा और करुणा का मार्ग दिखा रही है।