व्यंग्य: आस्था, बाबा संस्कृति और अंधभक्ति पर तीखा कटाक्ष

समाज में स्वयंभू चमत्कारी बाबाओं और अंधभक्ति की बढ़ती प्रवृत्ति पर एक व्यंग्यात्मक लेख इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। लेख में काल्पनिक संवाद के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि किस प्रकार कुछ लोग आध्यात्मिकता को सेवा का नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा, प्रभाव और आर्थिक लाभ का माध्यम बना देते हैं। व्यंग्य में एक कथित गुरु अपने शिष्य से कहता है कि आईएएस, आईपीएस, डॉक्टर, इंजीनियर या राजनेता बनने से बेहतर है कि वह “बाबा” बन जाए, क्योंकि बड़े-बड़े अधिकारी, नेता और उद्योगपति भी बाबाओं के दरबार में आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं। आगे तंज कसते हुए कहा गया है कि इस “पेशे” में न किसी निवेश की आवश्यकता होती है और न ही उत्पादन या कर की चिंता। केवल श्रद्धालुओं की आस्था ही सबसे बड़ी पूंजी बन जाती है। लेख में यह भी व्यंग्य किया गया है कि आत्मा, परमात्मा, स्वर्ग, नरक, पाप-पुण्य, धर्म और राष्ट्र जैसे विषयों पर पूरे आत्मविश्वास से बोलने वाला व्यक्ति आसानी से “ज्ञानी” कहलाने लगता है। कठिन प्रश्नों के उत्तर में “यह सब ईश्वर की इच्छा है” जैसे वाक्यों का सहारा लेने की प्रवृत्ति पर भी कटाक्ष किया गया है। व्यंग्य का निष्कर्ष यह है कि जब समाज में तर्क, वैज्ञानिक सोच और प्रश्न पूछने की संस्कृति कमजोर पड़ती है, तब अंधश्रद्धा और चमत्कारों का कारोबार फलने-फूलने लगता है। लेखक संकेत देता है कि पढ़ा-लिखा और विवेकशील व्यक्ति किसी भी दावे पर प्रश्न करेगा, जबकि अंधभक्ति प्रश्नों की बजाय केवल विश्वास पर आधारित होती है। यह रचना किसी व्यक्ति विशेष पर टिप्पणी नहीं, बल्कि समाज में व्याप्त अंधभक्ति, चमत्कारवाद और बिना तर्क के विश्वास करने की प्रवृत्ति पर व्यंग्य के रूप में देखी जानी चाहिए।

मुफ्ती मोहम्मद सईद के गृहमंत्री बनने और कश्मीरी पंडितों के पलायन पर एक विशेष रिपोर्ट

नई दिल्ली/श्रीनगर। कश्मीर में कश्मीरी पंडितों का पलायन भारतीय इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक माना जाता है। समय-समय पर यह दावा किया जाता है कि देश में Mufti Mohammad Sayeed के केंद्रीय गृहमंत्री बनने के बाद कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। हालांकि इतिहासकारों और विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार इस विषय को व्यापक राजनीतिक, सामाजिक और सुरक्षा परिस्थितियों के संदर्भ में समझना आवश्यक है। दिसंबर 1989 में केंद्र में बनी सरकार में मुफ्ती मोहम्मद सईद को भारत का गृहमंत्री बनाया गया था। वे इस पद पर पहुंचने वाले पहले कश्मीरी नेता थे। उसी समय जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद और उग्रवाद तेजी से बढ़ रहा था। पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठनों की गतिविधियां बढ़ने लगी थीं और घाटी में सुरक्षा स्थिति लगातार बिगड़ रही थी। इसी दौरान तत्कालीन गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी Rubaiya Sayeed का आतंकवादियों द्वारा अपहरण कर लिया गया। उनकी रिहाई के बदले सरकार ने कुछ आतंकवादियों को छोड़ा। इस घटना को कई विश्लेषक जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के मनोबल को बढ़ाने वाली महत्वपूर्ण घटनाओं में गिनते हैं। 1990 की शुरुआत में कश्मीर घाटी में आतंकवादी संगठनों द्वारा कई हत्याएं, धमकियां और डर का माहौल पैदा किया गया। अनेक कश्मीरी पंडित परिवारों ने आरोप लगाया कि उन्हें निशाना बनाया गया और अपनी सुरक्षा के लिए घाटी छोड़नी पड़ी। उस समय राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति गंभीर हो गई थी। केंद्र सरकार ने बाद में Jagmohan को जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल नियुक्त किया। विशेषज्ञों का मानना है कि कश्मीरी पंडितों का पलायन किसी एक व्यक्ति या एक निर्णय का परिणाम नहीं था, बल्कि आतंकवाद, राजनीतिक अस्थिरता, प्रशासनिक विफलताओं और सुरक्षा चुनौतियों के संयुक्त प्रभाव का नतीजा था। इस विषय पर आज भी राजनीतिक दलों और इतिहासकारों के बीच अलग-अलग मत मौजूद हैं। कश्मीरी पंडितों के विस्थापन की त्रासदी आज भी राष्ट्रीय विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हजारों परिवार दशकों तक अपने घरों से दूर रहने को मजबूर रहे। उनके पुनर्वास, न्याय और सुरक्षित वापसी को लेकर लगातार चर्चा होती रही है। कश्मीर की यह घटना भारत के इतिहास में एक ऐसे अध्याय के रूप में दर्ज है, जिसकी पीड़ा आज भी अनेक परिवार महसूस करते हैं।

क्या है स्वदेशी प्लेटफॉर्म Zoho? जिसे रेलमंत्री भी कर चुके हैं इस्तेमाल — माइक्रोसॉफ्ट और गूगल को टक्कर देने वाला भारतीय टेक दिग्गजक्या है स्वदेशी प्लेटफॉर्म Zoho? जिसे रेलमंत्री भी रहे इस्तेमाल, माइक्रोसॉफ्ट और गूगल को देगा टक्कर

Zoho

स्वदेशी प्लेटफॉर्म Zoho: भारतीय टेक्नोलॉजी की दुनिया में क्रांति भारत ने पिछले कुछ वर्षों में टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में कई नई ऊंचाइयां हासिल की हैं। इन्हीं में से एक चमकता हुआ नाम है Zoho Corporation, जो पूरी तरह से भारतीय स्वदेशी सॉफ्टवेयर कंपनी है। यह प्लेटफॉर्म न केवल भारत में बल्कि दुनियाभर में माइक्रोसॉफ्ट और गूगल जैसी दिग्गज कंपनियों को चुनौती दे रहा है। रेलमंत्री समेत कई सरकारी अधिकारी हैं इसके यूज़र Zoho की लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत के रेलमंत्री अश्विनी वैष्णव ने भी इस स्वदेशी प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने की पुष्टि की थी। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा कि वे Zoho का प्रयोग करते हैं क्योंकि यह “पूरी तरह भारतीय और सुरक्षित” है।यह बयान आने के बाद Zoho का नाम देशभर में ट्रेंड करने लगा और लोगों ने इस प्लेटफॉर्म को विदेशी विकल्पों के मुकाबले अपनाने की दिशा में रुचि दिखानी शुरू की। क्या है Zoho? Zoho Corporation एक भारतीय सॉफ्टवेयर कंपनी है जिसकी स्थापना 1996 में श्रीधर वेम्बू (Sridhar Vembu) ने की थी। इसका मुख्यालय चेन्नई और अमेरिका के कैलिफोर्निया में स्थित है।Zoho कई तरह के क्लाउड-आधारित बिज़नेस टूल्स और एप्लिकेशन प्रदान करता है, जिनमें शामिल हैं: इन सेवाओं के ज़रिए कंपनियां अपने पूरे बिज़नेस सिस्टम को डिजिटल रूप से चला सकती हैं — बिना माइक्रोसॉफ्ट 365 या गूगल वर्कस्पेस पर निर्भर हुए। Zoho क्यों है खास? दुनिया में बढ़ता प्रभाव Zoho के आज 100 मिलियन (10 करोड़) से ज़्यादा यूज़र हैं। यह 180 से अधिक देशों में अपनी सेवाएं दे रहा है।भारत के अलावा अमेरिका, जापान, सिंगापुर और यूरोप में भी Zoho का बड़ा ग्राहक आधार है। कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियां अब Zoho के टूल्स को अपने सिस्टम में इंटीग्रेट कर रही हैं। माइक्रोसॉफ्ट और गूगल को दे रहा है टक्कर Zoho का पूरा ईकोसिस्टम (ईमेल, डॉक्यूमेंट, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, अकाउंटिंग, CRM आदि) इसे सीधे तौर पर Microsoft 365 और Google Workspace के बराबर खड़ा करता है।जहां विदेशी प्लेटफॉर्म्स के लिए भारत को केवल एक “मार्केट” के रूप में देखा जाता है, वहीं Zoho ने भारत को “इनोवेशन सेंटर” बना दिया है। संस्थापक का विज़न Zoho के सीईओ श्रीधर वेम्बू का कहना है — “हमारा लक्ष्य सिर्फ सॉफ्टवेयर बेचना नहीं, बल्कि भारत को तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर बनाना है।” वेम्बू ने ग्रामीण क्षेत्रों में Zoho के R&D सेंटर खोलकर यह साबित किया है कि भारत के छोटे कस्बों से भी विश्वस्तरीय तकनीक विकसित की जा सकती है। निष्कर्ष Zoho आज भारत की उस नई टेक पहचान का प्रतीक बन चुका है जो “Made in India, Built for the World” की भावना को साकार करता है।रेलमंत्री से लेकर छोटे स्टार्टअप तक, हर कोई इस स्वदेशी प्लेटफॉर्म की ओर रुख कर रहा है। आने वाले समय में Zoho, भारत की डिजिटल स्वतंत्रता की दिशा में एक अहम कदम साबित हो सकता है।