मुफ्ती मोहम्मद सईद के गृहमंत्री बनने और कश्मीरी पंडितों के पलायन पर एक विशेष रिपोर्ट

नई दिल्ली/श्रीनगर। कश्मीर में कश्मीरी पंडितों का पलायन भारतीय इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक माना जाता है। समय-समय पर यह दावा किया जाता है कि देश में Mufti Mohammad Sayeed के केंद्रीय गृहमंत्री बनने के बाद कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। हालांकि इतिहासकारों और विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार इस विषय को व्यापक राजनीतिक, सामाजिक और सुरक्षा परिस्थितियों के संदर्भ में समझना आवश्यक है। दिसंबर 1989 में केंद्र में बनी सरकार में मुफ्ती मोहम्मद सईद को भारत का गृहमंत्री बनाया गया था। वे इस पद पर पहुंचने वाले पहले कश्मीरी नेता थे। उसी समय जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद और उग्रवाद तेजी से बढ़ रहा था। पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठनों की गतिविधियां बढ़ने लगी थीं और घाटी में सुरक्षा स्थिति लगातार बिगड़ रही थी। इसी दौरान तत्कालीन गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी Rubaiya Sayeed का आतंकवादियों द्वारा अपहरण कर लिया गया। उनकी रिहाई के बदले सरकार ने कुछ आतंकवादियों को छोड़ा। इस घटना को कई विश्लेषक जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के मनोबल को बढ़ाने वाली महत्वपूर्ण घटनाओं में गिनते हैं। 1990 की शुरुआत में कश्मीर घाटी में आतंकवादी संगठनों द्वारा कई हत्याएं, धमकियां और डर का माहौल पैदा किया गया। अनेक कश्मीरी पंडित परिवारों ने आरोप लगाया कि उन्हें निशाना बनाया गया और अपनी सुरक्षा के लिए घाटी छोड़नी पड़ी। उस समय राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति गंभीर हो गई थी। केंद्र सरकार ने बाद में Jagmohan को जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल नियुक्त किया। विशेषज्ञों का मानना है कि कश्मीरी पंडितों का पलायन किसी एक व्यक्ति या एक निर्णय का परिणाम नहीं था, बल्कि आतंकवाद, राजनीतिक अस्थिरता, प्रशासनिक विफलताओं और सुरक्षा चुनौतियों के संयुक्त प्रभाव का नतीजा था। इस विषय पर आज भी राजनीतिक दलों और इतिहासकारों के बीच अलग-अलग मत मौजूद हैं। कश्मीरी पंडितों के विस्थापन की त्रासदी आज भी राष्ट्रीय विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हजारों परिवार दशकों तक अपने घरों से दूर रहने को मजबूर रहे। उनके पुनर्वास, न्याय और सुरक्षित वापसी को लेकर लगातार चर्चा होती रही है। कश्मीर की यह घटना भारत के इतिहास में एक ऐसे अध्याय के रूप में दर्ज है, जिसकी पीड़ा आज भी अनेक परिवार महसूस करते हैं।