-डॉ शिवशक्ति प्रसाद द्विवेदी की कलम से

गर्मी की दोपहर, धूल भरी गली, और जेब में खनखनाती काँच की गोलियाँ — बस यही तो था हमारा खज़ाना। “गोलियाँ” या “काँचा” खेलना केवल खेल नहीं था, वह हमारी दोस्ती, प्रतिस्पर्धा और मासूम खुशियों का उत्सव था।
ज़मीन पर उँगली से छोटा सा गड्ढा बनाना, निशाना साधते समय सांस रोक लेना, और जैसे ही अपनी गोली सटीक टकराती — मन में विजयी मुस्कान खिल उठती। कभी हारते तो उदासी भी होती, पर अगले ही पल फिर चुनौती देने को तैयार। न कोई मोबाइल, न कोई स्क्रीन — बस मिट्टी की सोंधी खुशबू और दोस्तों की खिलखिलाहट।
आज जब उन पलों को याद करता हूँ, तो लगता है कि असली अमीरी जेब में नहीं, उन रंग-बिरंगी गोलियों और बेफिक्र हँसी में थी। बचपन की वही छोटी-सी दुनिया, सच में सबसे बड़ी दुनिया थी।