स्थायी समिति अध्यक्ष पद के लिए सत्या शर्मा ने भरा नामांकन, पार्टी नेतृत्व का जताया आभार

माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार , माननीय मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और माननीय भाजपा दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष हर्ष मल्होत्रा के नेतृत्व में दिल्ली सरकार के सहयोग से एमसीडी को बनाएंगे और मजबूत : सत्या शर्मा दिल्ली नगर निगम की स्थायी समिति के अध्यक्ष पद के लिए नामांकन दाखिल करतीं भाजपा की वरिष्ठ पार्षद सत्या शर्मा। नई दिल्ली: दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) की स्थायी समिति के अध्यक्ष पद के लिए भाजपा की वरिष्ठ पार्षद सत्या शर्मा ने नामांकन दाखिल किया। इस दौरान उन्होंने दोबारा महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलने पर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के मार्गदर्शन, भाजपा दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष हर्ष मल्होत्रा तथा मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के नेतृत्व में दिल्ली सरकार के सहयोग से एमसीडी को और अधिक प्रभावी, पारदर्शी एवं जनहितकारी बनाया जाएगा। नामांकन के बाद मीडिया से बातचीत में सत्या शर्मा ने कहा कि पार्टी ने उन पर जो विश्वास जताया है, वह उनके लिए सम्मान के साथ-साथ बड़ी जिम्मेदारी भी है। उन्होंने कहा कि उनका मुख्य लक्ष्य वर्ष 2022 के एमसीडी चुनाव के दौरान भाजपा द्वारा जनता से किए गए वादों को पूरा करना होगा। उन्होंने दावा किया कि भाजपा ने सत्ता संभालने के लगभग एक वर्ष के भीतर अपने चुनावी घोषणापत्र के कई वादे पूरे किए हैं और कई ऐसे कार्य भी किए हैं, जिनका उल्लेख घोषणापत्र में नहीं था। उन्होंने कहा कि पिछले वित्तीय वर्ष में स्थायी समिति की अध्यक्ष के रूप में प्रस्तुत बजट में की गई घोषणाओं को धरातल पर उतारना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल रहेगा। साथ ही सफाई व्यवस्था, कूड़ा प्रबंधन, पार्कों के रखरखाव, सड़कों और अन्य मूलभूत सुविधाओं में सुधार पर विशेष जोर दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि भलस्वा, ओखला और गाज़ीपुर के कूड़े के पहाड़ों को समाप्त करने की दिशा में तेजी से कार्य किया जा रहा है। सत्या शर्मा ने कहा कि केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच बेहतर समन्वय का लाभ राजधानी के नागरिकों को मिल रहा है और विकास कार्यों को नई गति मिली है। एमसीडी की स्थायी समिति में भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत है। समिति के कुल 18 सदस्यों में भाजपा के 12 सदस्य हैं, जबकि अन्य दलों के छह सदस्य हैं। ऐसे में स्थायी समिति के अध्यक्ष पद पर सत्या शर्मा का चुना जाना लगभग तय माना जा रहा है।

व्यंग्य: आस्था, बाबा संस्कृति और अंधभक्ति पर तीखा कटाक्ष

समाज में स्वयंभू चमत्कारी बाबाओं और अंधभक्ति की बढ़ती प्रवृत्ति पर एक व्यंग्यात्मक लेख इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। लेख में काल्पनिक संवाद के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि किस प्रकार कुछ लोग आध्यात्मिकता को सेवा का नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा, प्रभाव और आर्थिक लाभ का माध्यम बना देते हैं। व्यंग्य में एक कथित गुरु अपने शिष्य से कहता है कि आईएएस, आईपीएस, डॉक्टर, इंजीनियर या राजनेता बनने से बेहतर है कि वह “बाबा” बन जाए, क्योंकि बड़े-बड़े अधिकारी, नेता और उद्योगपति भी बाबाओं के दरबार में आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं। आगे तंज कसते हुए कहा गया है कि इस “पेशे” में न किसी निवेश की आवश्यकता होती है और न ही उत्पादन या कर की चिंता। केवल श्रद्धालुओं की आस्था ही सबसे बड़ी पूंजी बन जाती है। लेख में यह भी व्यंग्य किया गया है कि आत्मा, परमात्मा, स्वर्ग, नरक, पाप-पुण्य, धर्म और राष्ट्र जैसे विषयों पर पूरे आत्मविश्वास से बोलने वाला व्यक्ति आसानी से “ज्ञानी” कहलाने लगता है। कठिन प्रश्नों के उत्तर में “यह सब ईश्वर की इच्छा है” जैसे वाक्यों का सहारा लेने की प्रवृत्ति पर भी कटाक्ष किया गया है। व्यंग्य का निष्कर्ष यह है कि जब समाज में तर्क, वैज्ञानिक सोच और प्रश्न पूछने की संस्कृति कमजोर पड़ती है, तब अंधश्रद्धा और चमत्कारों का कारोबार फलने-फूलने लगता है। लेखक संकेत देता है कि पढ़ा-लिखा और विवेकशील व्यक्ति किसी भी दावे पर प्रश्न करेगा, जबकि अंधभक्ति प्रश्नों की बजाय केवल विश्वास पर आधारित होती है। यह रचना किसी व्यक्ति विशेष पर टिप्पणी नहीं, बल्कि समाज में व्याप्त अंधभक्ति, चमत्कारवाद और बिना तर्क के विश्वास करने की प्रवृत्ति पर व्यंग्य के रूप में देखी जानी चाहिए।

मुफ्ती मोहम्मद सईद के गृहमंत्री बनने और कश्मीरी पंडितों के पलायन पर एक विशेष रिपोर्ट

नई दिल्ली/श्रीनगर। कश्मीर में कश्मीरी पंडितों का पलायन भारतीय इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक माना जाता है। समय-समय पर यह दावा किया जाता है कि देश में Mufti Mohammad Sayeed के केंद्रीय गृहमंत्री बनने के बाद कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। हालांकि इतिहासकारों और विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार इस विषय को व्यापक राजनीतिक, सामाजिक और सुरक्षा परिस्थितियों के संदर्भ में समझना आवश्यक है। दिसंबर 1989 में केंद्र में बनी सरकार में मुफ्ती मोहम्मद सईद को भारत का गृहमंत्री बनाया गया था। वे इस पद पर पहुंचने वाले पहले कश्मीरी नेता थे। उसी समय जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद और उग्रवाद तेजी से बढ़ रहा था। पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठनों की गतिविधियां बढ़ने लगी थीं और घाटी में सुरक्षा स्थिति लगातार बिगड़ रही थी। इसी दौरान तत्कालीन गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी Rubaiya Sayeed का आतंकवादियों द्वारा अपहरण कर लिया गया। उनकी रिहाई के बदले सरकार ने कुछ आतंकवादियों को छोड़ा। इस घटना को कई विश्लेषक जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के मनोबल को बढ़ाने वाली महत्वपूर्ण घटनाओं में गिनते हैं। 1990 की शुरुआत में कश्मीर घाटी में आतंकवादी संगठनों द्वारा कई हत्याएं, धमकियां और डर का माहौल पैदा किया गया। अनेक कश्मीरी पंडित परिवारों ने आरोप लगाया कि उन्हें निशाना बनाया गया और अपनी सुरक्षा के लिए घाटी छोड़नी पड़ी। उस समय राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति गंभीर हो गई थी। केंद्र सरकार ने बाद में Jagmohan को जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल नियुक्त किया। विशेषज्ञों का मानना है कि कश्मीरी पंडितों का पलायन किसी एक व्यक्ति या एक निर्णय का परिणाम नहीं था, बल्कि आतंकवाद, राजनीतिक अस्थिरता, प्रशासनिक विफलताओं और सुरक्षा चुनौतियों के संयुक्त प्रभाव का नतीजा था। इस विषय पर आज भी राजनीतिक दलों और इतिहासकारों के बीच अलग-अलग मत मौजूद हैं। कश्मीरी पंडितों के विस्थापन की त्रासदी आज भी राष्ट्रीय विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हजारों परिवार दशकों तक अपने घरों से दूर रहने को मजबूर रहे। उनके पुनर्वास, न्याय और सुरक्षित वापसी को लेकर लगातार चर्चा होती रही है। कश्मीर की यह घटना भारत के इतिहास में एक ऐसे अध्याय के रूप में दर्ज है, जिसकी पीड़ा आज भी अनेक परिवार महसूस करते हैं।

भारत-अमेरिका कृषि सहयोग को नई दिशा देने हेतु इफको अध्यक्ष दिलीप संघाणी के नेतृत्व में महत्वपूर्ण संवाद

–वॉशिंगटन डी.सी. में आयोजित भारत-अमेरिका कृषि सहयोग बैठक के दौरान इफको अध्यक्ष दिलीप संघाणी के नेतृत्व में PHDCCI प्रतिनिधिमंडल एवं USIBC के प्रतिनिधि। नई दिल्ली। वॉशिंगटन डी.सी. स्थितयू.एस.-इंडिया बिजनेस काउंसिल (यूएसआईबीसी) द्वारा इफको के अध्यक्ष श्री दिलीप संघाणी के नेतृत्व में आए पीएचडीसीसीआई प्रतिनिधिमंडल की मेजबानी किया जाना इस बैठक के महत्व और प्रभाव को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। बैठक के उपरांत यूएसआईबीसी ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया मंच पर इस संवाद को भारत-अमेरिका कृषि सहयोग को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताया। यूएसआईबीसी ने अपने संदेश में उल्लेख किया कि श्री दिलीप संघाणी के नेतृत्व में हुए विचार-विमर्श ने कृषि क्षेत्र में भारत और अमेरिका के बीच सहयोग को नई ऊर्जा प्रदान करने, साझा चुनौतियों के समाधान तलाशने तथा उभरते अवसरों पर सार्थक चर्चा का मार्ग प्रशस्त किया। परिषद ने विशेष रूप से नवाचार-आधारित कृषि नीतियों, टिकाऊ कृषि विकास, खाद्य सुरक्षा तथा किसानों की समृद्धि के लिए दोनों देशों के बीच मजबूत साझेदारी की आवश्यकता पर बल दिया। यह उल्लेखनीय है कि अमेरिका के प्रतिष्ठित उद्योग एवं व्यापार संगठन यूएसआईबीसी द्वारा इस बैठक को सार्वजनिक रूप से प्रमुखता देना भारतीय सहकारिता आंदोलन की बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता, इफको की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा तथा श्री दिलीप संघाणी के नेतृत्व में भारतीय किसानों के हितों को वैश्विक मंचों पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किए जाने का प्रमाण है। बैठक के दौरान कृषि उत्पादकता बढ़ाने, उन्नत कृषि तकनीकों के उपयोग, भूमि स्वास्थ्य सुधार, किसानों को तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने, नवाचार-आधारित कृषि समाधान विकसित करने तथा खाद्य एवं पोषण सुरक्षा को मजबूत बनाने जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत चर्चा हुई। दोनों देशों के कृषि विशेषज्ञों, नीति-निर्माताओं एवं उद्योग प्रतिनिधियों ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि भारत और अमेरिका के बीच बढ़ता सहयोग कृषि क्षेत्र में नई संभावनाओं के द्वार खोलेगा तथा किसानों के लिए दीर्घकालिक लाभ सुनिश्चित करेगा। श्री दिलीप संघाणी के नेतृत्व में आयोजित यह संवाद भारत-अमेरिका कृषि साझेदारी को नई दिशा देने, सहकारिता आधारित कृषि विकास को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने तथा किसानों की आय, उत्पादकता और कृषि सुरक्षा को सुदृढ़ बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

IRES 2026 के दूसरे दिन उमड़ा छात्रों और अभिभावकों का उत्साह, रूसी विश्वविद्यालयों ने पेश किए वैश्विक शिक्षा के अवसर

नई दिल्ली, भारत : द्वितीय इंडो-रशियन एजुकेशन समिट 2026 (IRES 2026) के दूसरे दिन छात्रों, अभिभावकों, शिक्षकों और अकादमिक काउंसलर्स की उल्लेखनीय भागीदारी देखने को मिली। समिट के दौरान प्रतिभागियों को प्रमुख रूसी विश्वविद्यालयों और अंतरराष्ट्रीय शिक्षा के अवसरों से सीधे जुड़ने का अवसर प्रदान किया गया।रूस एजुकेशन द्वारा Rossotrudnichestvo, भारत में रूसी संघ के दूतावास तथा रूसी हाउस, नई दिल्ली के सहयोग से आयोजित इस समिट के दूसरे दिन का मुख्य उद्देश्य छात्रों को रूसी विश्वविद्यालयों, अकादमिक विशेषज्ञों और शिक्षा जगत के नेताओं से जोड़ना था।कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण “रूसी विश्वविद्यालय प्रदर्शनी” रही, जिसमें 100 से अधिक विश्वविद्यालयों और 200 से अधिक विश्वविद्यालय प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस प्रदर्शनी ने छात्रों और अभिभावकों को विश्वविद्यालय प्रतिनिधियों से सीधे संवाद करने तथा शैक्षणिक पाठ्यक्रमों, प्रवेश प्रक्रिया, छात्रवृत्ति, आवास सुविधाओं, वीज़ा सहायता, छात्र जीवन और भविष्य के करियर अवसरों की विस्तृत जानकारी प्राप्त करने का मंच प्रदान किया।प्रदर्शनी में मेडिसिन, डेंटिस्ट्री, इंजीनियरिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, एविएशन, सूचना प्रौद्योगिकी, मैनेजमेंट, कृषि, वेटरिनरी साइंसेज, बायोटेक्नोलॉजी, ह्यूमैनिटीज, इंटरनेशनल रिलेशंस और रूसी भाषा अध्ययन जैसे विभिन्न क्षेत्रों में उपलब्ध अवसरों को प्रदर्शित किया गया।पूरे दिन के दौरान 1,500 से अधिक छात्रों और अभिभावकों ने विश्वविद्यालय प्रतिनिधियों और शिक्षा विशेषज्ञों के साथ व्यक्तिगत काउंसलिंग सत्रों और इंटरैक्टिव चर्चाओं में भाग लिया। इन चर्चाओं के माध्यम से छात्रों को विभिन्न विश्वविद्यालयों की तुलना करने, पात्रता मानदंड समझने, छात्रवृत्ति के अवसरों की जानकारी प्राप्त करने और अपने शैक्षणिक भविष्य के लिए व्यक्तिगत मार्गदर्शन प्राप्त करने का अवसर मिला। प्रतिभागियों की उत्साहपूर्ण भागीदारी ने रूस में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के प्रति बढ़ती रुचि को दर्शाया।अभिभावकों ने भी विश्वविद्यालय प्रतिनिधियों से सक्रिय रूप से संवाद कर छात्र सहायता सेवाओं, कैंपस सुविधाओं, आवास व्यवस्था, सुरक्षा उपायों और अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए उपलब्ध करियर अवसरों के बारे में जानकारी प्राप्त की। समिट के दौरान बड़ी संख्या में छात्रों ने प्रमुख रूसी विश्वविद्यालयों में प्रवेश प्रक्रियाएँ प्रारंभ एवं पूर्ण कीं, जिससे यह कार्यक्रम शैक्षणिक निर्णय और भविष्य के अवसरों के लिए अत्यंत उपयोगी मंच साबित हुआ।छात्र सहभागिता के अलावा, समिट ने भारतीय और रूसी शैक्षणिक संस्थानों के बीच सहयोग को मजबूत करने हेतु संस्थागत चर्चाओं और अकादमिक संवाद को भी बढ़ावा दिया। प्रतिनिधियों ने अकादमिक एक्सचेंज, रिसर्च सहयोग, छात्र गतिशीलता और भविष्य की शैक्षणिक साझेदारियों पर विचार-विमर्श किया।समिट के महत्व पर प्रकाश डालते हुए रूस एजुकेशन के टेक्निकल एडवाइज़र एयर मार्शल (डॉ.) पवन कपूर (सेवानिवृत्त) ने कहा कि भारत और रूस के बीच 70 वर्षों से अधिक समय से विश्वासपूर्ण साझेदारी रही है, जो रक्षा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग पर आधारित है। उन्होंने कहा कि शैक्षणिक सहयोग छात्रों के लिए सार्थक अवसर उत्पन्न कर रहा है और यह द्विपक्षीय संबंधों के सबसे मजबूत स्तंभों में से एक है।भारत में Rossotrudnichestvo के प्रतिनिधि कार्यालय की प्रमुख डॉ. एलेना रेमिज़ोवा ने समिट में भाग लेने वाले भारतीय और रूसी विश्वविद्यालयों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने भारत और रूस के बीच मजबूत सांस्कृतिक और शैक्षणिक संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि रूस भारतीय छात्रों के लिए विविध शैक्षणिक और शोध अवसर उपलब्ध कराता है। उन्होंने कहा कि IRES जैसी पहलें शैक्षणिक सहयोग को मजबूत करने के साथ-साथ छात्रों के विकास, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और अंतरराष्ट्रीय करियर के नए मार्ग भी प्रशस्त करती हैं। मारी स्टेट यूनिवर्सिटी के रेक्टर प्रो. मिखाइल एन. श्वेत्सोव ने कहा कि रूसी विश्वविद्यालय भारतीय छात्रों का स्वागत गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक अवसंरचना, शोध अवसरों और सहयोगपूर्ण शिक्षण वातावरण के माध्यम से लगातार कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इंडो-रशियन एजुकेशन समिट जैसी पहलें छात्रों को विश्वविद्यालयों से सीधे जोड़ती हैं और उन्हें अपने शैक्षणिक भविष्य के संबंध में सूचित निर्णय लेने में सहायता करती हैं।समिट के दूसरे दिन ने छात्र-विश्वविद्यालय संवाद के महत्व को पुनः स्थापित किया और अंतरराष्ट्रीय शिक्षा के अवसरों की बढ़ती मांग को उजागर किया। छात्रों, अभिभावकों, विश्वविद्यालयों और शिक्षा विशेषज्ञों को एक मंच पर लाकर IRES 2026 ने शैक्षणिक खोज, सूचित निर्णय और सार्थक अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिए एक सशक्त वातावरण तैयार किया।रूस एजुकेशन भारत की विश्वसनीय शिक्षा परामर्श संस्थाओं में से एक है, जिसके पास रूसी संघ में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के इच्छुक छात्रों का मार्गदर्शन करने का 33 वर्षों से अधिक का अनुभव है। विश्वविद्यालय साझेदारियों, प्रवेश मार्गदर्शन, छात्र सहायता सेवाओं और विभिन्न अकादमिक पहलों के माध्यम से रूस एजुकेशन गुणवत्तापूर्ण अंतरराष्ट्रीय शिक्षा को बढ़ावा देने और भारत-रूस शैक्षणिक सहयोग को मजबूत करने के लिए निरंतर कार्य कर रहा है।

अवधूत परम्परा : सेवा, करुणा और मानव गरिमा का जीवंत संदेश

नई दिल्ली: भारतीय सनातन परम्परा में “अवधूत” धारा आध्यात्मिक साधना, करुणा और निःस्वार्थ सेवा का अद्वितीय संगम मानी जाती है। यह परम्परा केवल व्यक्तिगत मोक्ष या साधना तक सीमित नहीं रही, बल्कि समाज के उपेक्षित, पीड़ित और वंचित वर्गों को सम्मानपूर्ण जीवन प्रदान करने के लिए समर्पित रही है। अवधूत परम्परा का उद्भव भगवान दत्तात्रेय की अद्वैत चेतना से माना जाता है, जिसे आगे बाबा कीनाराम ने अघोर दर्शन के माध्यम से सामाजिक चेतना से जोड़ा। बाद में अवधूत भगवान राम ने इसे व्यापक मानव सेवा आन्दोलन का स्वरूप प्रदान किया। आज यह परम्परा उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, ओडिशा और छत्तीसगढ़ सहित अनेक राज्यों में स्वास्थ्य, शिक्षा, कुष्ठ सेवा, आदिवासी उत्थान और मानव गरिमा की रक्षा के लिए सक्रिय रूप से कार्य कर रही है। “अवधूत” का अर्थ है ऐसा साधक जिसने मोह, भय, घृणा, लोभ और सामाजिक भेदभाव का त्याग कर दिया हो। इस परम्परा का मूल संदेश है — “मानव सेवा ही ईश्वर सेवा है।” अवधूत साधक सम्पूर्ण सृष्टि को एक परिवार मानता है और हर प्राणी में परमात्मा का स्वरूप देखता है। इस परम्परा के दार्शनिक आधार में भगवान दत्तात्रेय का विशेष स्थान है, जिन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश का संयुक्त स्वरूप माना जाता है। उन्होंने यह शिक्षा दी कि वास्तविक ज्ञान केवल ग्रंथों से नहीं, बल्कि जीवन, प्रकृति और अनुभवों से प्राप्त होता है। 20वीं शताब्दी में अवधूत भगवान राम ने इस परम्परा को नई दिशा देते हुए आध्यात्मिकता को प्रत्यक्ष मानव सेवा से जोड़ा। उन्होंने विशेष रूप से कुष्ठ रोगियों, आदिवासियों, दलितों और समाज से बहिष्कृत वर्गों के बीच कार्य किया। उस समय कुष्ठ रोगियों को सामाजिक बहिष्कार और अपमान का सामना करना पड़ता था, लेकिन अवधूत भगवान राम ने उन्हें अपनाकर मानवता और करुणा का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया। वाराणसी स्थित “अवधूत भगवान राम कुष्ठ सेवा आश्रम” इस सेवा भावना का विश्वस्तरीय उदाहरण है। गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज जानकारी के अनुसार, आश्रम ने 99,045 पूर्ण कुष्ठ रोगियों तथा 1,47,503 आंशिक कुष्ठ रोगियों का उपचार कर मानव सेवा का ऐतिहासिक कार्य किया है। आश्रम की विशेषता केवल चिकित्सा सेवा तक सीमित नहीं रही, बल्कि रोगियों को सम्मान, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता से जोड़ने में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। भोजन, वस्त्र, आश्रय और उपचार के साथ सामुदायिक जीवन, श्रम, प्रार्थना और ध्यान के माध्यम से रोगियों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ा गया। अवधूत परम्परा की सेवा गतिविधियाँ वाराणसी तक सीमित नहीं हैं। बिहार, मध्य प्रदेश, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के दूरस्थ एवं आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य शिविर, निःशुल्क दवा वितरण, शिक्षा, छात्रावास और संस्कार केन्द्रों के माध्यम से हजारों लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाया गया है। आज जब समाज भौतिक प्रगति के बावजूद संवेदनहीनता, अकेलेपन और विभाजन जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब अवधूत परम्परा का संदेश अत्यंत प्रासंगिक हो उठता है। यह परम्परा हमें याद दिलाती है कि वास्तविक आध्यात्मिकता केवल पूजा-पाठ में नहीं, बल्कि पीड़ित मानवता के जीवन में सम्मान, आशा और आत्मविश्वास जगाने में निहित है। भगवान दत्तात्रेय से बाबा कीनाराम, अवधूत भगवान राम और परमपूज्य श्री प्रियदर्शी राम तक प्रवाहित यह करुणामयी धारा भारतीय संस्कृति की जीवंत आत्मा है, जो आज भी समाज को मानव सेवा और करुणा का मार्ग दिखा रही है।

रणवीर सिंह को घंटा बैन कर पाएगी बॉलीवुडविवाद और बॉलीवुड बहिष्कार की बहस : क्या इंडस्ट्री में विचारधारा की जंग शुरू हो चुकी है?

बॉलीवुड में अभिनेता Ranveer Singh को लेकर उठे विवाद ने फिल्म इंडस्ट्री के अंदर चल रही कथित गुटबाजी, वैचारिक संघर्ष और “बॉलीवुड बहिष्कार” की बहस को एक बार फिर तेज कर दिया है। सोशल मीडिया पर यह सवाल लगातार उठ रहा है कि आखिर रणवीर सिंह के साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया जा रहा है, जबकि इससे पहले कई बड़े सितारे शूटिंग के बीच फिल्में छोड़ चुके हैं और तब इंडस्ट्री ने उतनी कठोर प्रतिक्रिया नहीं दी थी। उदाहरण के तौर पर Aishwarya Rai Bachchan ने मधुर भंडारकर की फिल्म हीरोइन की शूटिंग बीच में छोड़ दी थी। उस समय खबरें आई थीं कि निर्देशक Madhur Bhandarkar मानसिक तनाव और डिप्रेशन तक में चले गए थे, क्योंकि फिल्म पर भारी निवेश हो चुका था। बाद में फिल्म में Kareena Kapoor Khan को लिया गया और प्रोजेक्ट पूरा हुआ। इसी तरह Abhishek Bachchan ने J. P. Dutta की फिल्म पलटन तब छोड़ी थी जब यूनिट लद्दाख पहुंच चुकी थी और शूटिंग शुरू होने वाली थी। इन दोनों मामलों में निर्माताओं को आर्थिक नुकसान हुआ, लेकिन किसी कलाकार के खिलाफ सार्वजनिक “बॉयकॉट” या इंडस्ट्री बैन जैसा माहौल नहीं बनाया गया। यहीं से रणवीर सिंह का मामला अलग दिखाई देता है। चर्चा यह है कि डॉन 3 को लेकर हुए विवाद के बाद निर्माता Farhan Akhtar और Ritesh Sidhwani की कंपनी एक्सेल एंटरटेनमेंट ने कड़ा रुख अपनाया। हालांकि आधिकारिक तौर पर किसी बैन की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन सोशल मीडिया पर इसे “सॉफ्ट बॉयकॉट” और “इंडस्ट्री दबाव” की तरह पेश किया जा रहा है। इस पूरे विवाद को केवल प्रोफेशनल मतभेद तक सीमित नहीं माना जा रहा। दरअसल हाल के महीनों में रणवीर सिंह की सार्वजनिक छवि में बड़ा बदलाव देखने को मिला। वे नागपुर स्थित आरएसएस मुख्यालय पहुंचे, संघ संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार को श्रद्धांजलि दी और संघ प्रमुख Mohan Bhagwat से मुलाकात की। इसके अलावा वे मंदिरों में दर्शन करते, माथे पर त्रिपुंड लगाए और भारतीय सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ दिखाई दिए। सोशल मीडिया पर उनके इस बदले हुए अंदाज को लेकर समर्थकों और विरोधियों के बीच तीखी बहस शुरू हो गई। कुछ लोगों का मानना है कि बॉलीवुड का एक वर्ग अब भी एक खास वैचारिक ढांचे में काम करता है और जो कलाकार उस ढांचे से अलग जाते दिखाई देते हैं, उन्हें असहज स्थिति का सामना करना पड़ता है। लेखिका Shobhaa De सहित कई टिप्पणीकारों ने भी समय-समय पर बॉलीवुड में बदलते वैचारिक माहौल को लेकर चिंता जताई है। वहीं दूसरी ओर कई लोग इसे केवल सोशल मीडिया की बनाई कहानी बताते हैं और कहते हैं कि फिल्म इंडस्ट्री हमेशा से व्यावसायिक हितों के आधार पर फैसले लेती रही है। पिछले कुछ वर्षों में “बॉलीवुड बहिष्कार” अभियान ने इंडस्ट्री को आर्थिक और मानसिक दोनों स्तर पर प्रभावित किया है। कई फिल्मों को सोशल मीडिया ट्रेंड्स के कारण नुकसान झेलना पड़ा। उस समय बॉलीवुड से जुड़े कई कलाकारों ने कहा था कि संगठित बहिष्कार की राजनीति फिल्म उद्योग के लिए खतरनाक है। लेकिन अब रणवीर सिंह विवाद के बाद सोशल मीडिया पर उल्टा सवाल पूछा जा रहा है कि यदि दर्शकों का बहिष्कार गलत था, तो किसी कलाकार को इंडस्ट्री के भीतर अलग-थलग करना कैसे सही माना जा सकता है? असल में यह विवाद केवल एक अभिनेता या एक फिल्म तक सीमित नहीं रह गया है। यह उस बड़े बदलाव की ओर इशारा करता है, जहां बॉलीवुड अब केवल मनोरंजन उद्योग नहीं बल्कि विचारधारा, छवि निर्माण और सार्वजनिक राजनीति का अखाड़ा बन चुका है। दर्शक भी अब फिल्मों को केवल कहानी और अभिनय के आधार पर नहीं देखते, बल्कि कलाकारों की व्यक्तिगत विचारधारा, सामाजिक छवि और राजनीतिक झुकाव पर भी प्रतिक्रिया देते हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि बॉलीवुड बदलते सामाजिक और राजनीतिक माहौल के साथ खुद को किस तरह ढालता है। क्योंकि अब दर्शक भी पहले जैसे नहीं रहे और सितारों की चमक पर सवाल पूछने लगे हैं।

भारत में महिला-नेतृत्व विकास- सशक्तिकरण से नेतृत्व तक

सरकार महिलाओं को आत्मनिर्भर और निर्णयकारी भूमिका में स्थापित करने की दिशा में कार्य कर रही नई दिल्ली। भारत में महिला सशक्तिकरण का उद्देश्य महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से स्वतंत्र, शिक्षित और समान अधिकार संपन्न बनाना है। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, मुद्रा योजना और महिला आरक्षण जैसे प्रयासों से निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी बढ़ी है। हालांकि, पितृसत्तात्मक सोच और सुरक्षा चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं, लेकिन शिक्षा व कानूनी सुधारों से बदलाव आ रहा है।भारत में महिलाओं के सशक्तिकरण की सोच अब एक व्यापक और जीवन-चक्र आधारित दृष्टिकोण में विकसित हो चुकी है, जहाँ जन्म से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका और नेतृत्व तक महिलाओं की आवश्यकताओं को समग्र रूप से संबोधित किया जा रहा है। भारत सरकार द्वारा संचालित विभिन्न योजनाएँ अब केवल कल्याण तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि वे महिलाओं को आत्मनिर्भर और निर्णयकारी भूमिका में स्थापित करने की दिशा में कार्य कर रही हैं। यह बदलाव “वेलफेयर” से “एम्पावरमेंट” और अब “वूमेन-लेड डेवलपमेंट” की ओर भारत की विकास यात्रा को दर्शाता है।स्वास्थ्य एवं पोषण के क्षेत्र में मिशन पोषण 2.0, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना और प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान जैसी पहलों ने महत्वपूर्ण सुधार सुनिश्चित किए हैं। वर्ष 2017 से फरवरी 2026 तक प्रधानमंत्री मातृत्व वंदना योजना के अंतर्गत लगभग 4.27 करोड़ महिलाओं को 20,101 करोड़ रूपये की सशर्त सहायता प्रदान की गई है। वहीं, प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत 7.26 करोड़ से अधिक गर्भवती महिलाओं की निःशुल्क जांच की गई है। देशभर में 14.03 लाख आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से 8.97 करोड़ से अधिक लाभार्थियों तक पोषण सेवाएँ पहुँच रही हैं, जबकि मिशन इंद्रधनुष के प्रभाव से बाल मृत्यु दर 48 से घटकर 28 और नवजात मृत्यु दर 28 से घटकर 17 हो गई है।“पोषण भी पढ़ाई भी” कार्यक्रम के तहत 8.55 लाख कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित किया गया है तथा सक्षम आंगनवाड़ी योजना के माध्यम से 1.03 लाख केंद्रों को उन्नत किया जा चुका है। वित्तीय समावेशन के क्षेत्र में प्रधानमंत्री जन धन योजना, प्रधानमंत्री मुद्रा योजना और स्टैंड-अप इंडिया योजना ने महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने में अहम भूमिका निभाई है।प्रधानमंत्री जन धन योजना के अंतर्गत 57.93 करोड़ खातों में से 32.29 करोड़ खाते महिलाओं के नाम हैं, जो वित्तीय समावेशन की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि है। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के तहत वितरित कुल ऋणों में लगभग 68 प्रतिशत महिलाओं को दिए गए हैं, जिनकी कुल राशि 14.72 लाख करोड़ रूपये से अधिक है। स्टैंड-अप इंडिया योजना के तहत स्वीकृत ऋणों में 83 प्रतिशत लाभार्थी महिलाएँ हैं, जिनकी राशि 47,704 करोड़ रूपये से अधिक है।दीनदयाल अंत्योदय योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत 10.05 करोड़ महिलाएँ स्वयं सहायता समूहों से जुड़ चुकी हैं, जबकि “लखपति दीदी” पहल के माध्यम से 3.07 करोड़ महिलाएँ आत्मनिर्भर बनने की दिशा में अग्रसर हुई हैं। “नमो ड्रोन दीदी योजना” के तहत 1,094 ड्रोन वितरित कर महिलाओं को आधुनिक तकनीक से भी जोड़ा जा रहा है।दैनिक जीवन में गरिमा सुनिश्चित करने के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, स्वच्छ भारत मिशन और जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं ने व्यापक बदलाव लाया है। प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के अंतर्गत 2.90 करोड़ से अधिक घर महिलाओं के नाम आवंटित किए गए हैं, जिससे उनके सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण को बल मिला है। उज्ज्वला योजना के तहत 10.5 करोड़ से अधिक गैस कनेक्शन प्रदान किए गए हैं, जिससे महिलाओं को धुएँ से मुक्ति और स्वास्थ्य लाभ मिला है। स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत 12.11 करोड़ से अधिक शौचालयों का निर्माण हुआ है, जिससे महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित हुई है। जल जीवन मिशन के माध्यम से 15.83 करोड़ से अधिक घरों तक नल जल की सुविधा पहुँचाई गई है, जिससे महिलाओं के दैनिक श्रम में उल्लेखनीय कमी आई है।शिक्षा एवं कौशल विकास के क्षेत्र में बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, सुकन्या समृद्धि योजना और कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय जैसी पहलों ने सकारात्मक परिवर्तन सुनिश्चित किया है। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान के परिणामस्वरूप जन्म के समय लिंगानुपात 918 से बढ़कर 929 हो गया है। सुकन्या समृद्धि योजना के अंतर्गत 4.6 करोड़ से अधिक खाते खोले गए हैं, जिनमें 3.40 लाख करोड़ रूपये से अधिक की राशि जमा है। कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों के 5,316 स्कूलों में 7.58 लाख से अधिक छात्राएँ अध्ययनरत हैं। उच्च शिक्षा में महिलाओं का सकल नामांकन अनुपात 30.2 प्रतिशत तक पहुँच गया है, जबकि पीएचडी में महिलाओं के नामांकन में 135.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। । AICTE प्रगति योजना के तहत 35,998 छात्राएँ लाभान्वित हुई हैं तथा विज्ञान ज्योति योजना से 80,000 से अधिक छात्राओं को प्रोत्साहन मिला है।महिलाओं की सुरक्षा और संरक्षा के लिए मिशन शक्ति के अंतर्गत “सम्बल” और “समर्थ्य” दो स्तंभों पर कार्य किया जा रहा है। वन स्टॉप सेंटरों की संख्या 926 तक पहुँच चुकी है, जहाँ 13.90 लाख से अधिक महिलाओं को सहायता प्रदान की गई है। महिला हेल्पलाइन (181 और 112) के माध्यम से 99.09 लाख महिलाओं को सहयोग मिला है। SHe-Box पोर्टल से 1.63 लाख कार्यस्थल जुड़े हैं, जिससे कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित हुई है। वहीं “समर्थ्य” घटक के अंतर्गत 416 शक्ति सदन और 531 सखी निवास संचालित किए जा रहे हैं, जो महिलाओं को सुरक्षित आश्रय और पुनर्वास प्रदान कर रहे हैं।अंततः भारत में महिला सशक्तिकरण अब केवल योजनाओं का क्रियान्वयन नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन का आधार बन चुका है।

OK मॉडल स्कूल, उत्तम नगर में शनाया शर्मा और अजय हुड्डा को ‘सेलिब्रिटी गेस्ट’ के रूप में सम्मान

यह सम्मान समाज में उनके उल्लेखनीय योगदान और प्रेरणादायक कार्यों के लिए प्रदान किया गया। नई दिल्ली। OK मॉडल स्कूल में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम के दौरान अभिनेत्री, मॉडल एवं सामाजिक कार्यकर्ता शनाया शर्मा तथा हरियाणवी गायक अजय हुड्डा को ‘सेलिब्रिटी गेस्ट’ के रूप में सम्मानित किया गया। यह सम्मान समाज में उनके उल्लेखनीय योगदान और प्रेरणादायक कार्यों के लिए प्रदान किया गया। कार्यक्रम के दौरान शनाया शर्मा ने अपने संबोधन में स्कूल प्रबंधन का आभार जताते हुए कहा कि यह सम्मान उनके लिए अत्यंत गर्व और प्रेरणा का विषय है। उन्होंने कहा कि OK मॉडल स्कूल जैसी संस्थाएं शिक्षा के साथ-साथ सामाजिक मूल्यों को भी मजबूत करने का कार्य कर रही हैं, जो सराहनीय है। उन्होंने स्कूल द्वारा सांस्कृतिक और नैतिक शिक्षा को बढ़ावा देने के प्रयासों की प्रशंसा करते हुए कहा कि ऐसे मंच युवाओं को सही दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। साथ ही, उन्होंने अपने परिवार, मित्रों और शुभचिंतकों के समर्थन को अपनी सफलता का आधार बताया। इस अवसर पर अजय हुड्डा की उपस्थिति ने भी कार्यक्रम में उत्साह का संचार किया। कार्यक्रम के दौरान सामाजिक सहयोग, शिक्षा के महत्व और युवा पीढ़ी को प्रेरित करने पर विशेष जोर दिया गया। स्कूल प्रशासन ने बताया कि इस तरह के आयोजन छात्रों को प्रेरित करने और समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारियों को समझाने में सहायक सिद्ध होते हैं।

दिल्ली बजट से एमसीडी को बड़ी राहत: ₹11,266 करोड़ फंड से विकास कार्यों को मिलेगी रफ्तार: सत्या शर्मा

स्थायी समिति अध्यक्ष श्रीमती सत्या शर्मा ने मुख्यमंत्री श्रीमती रेखा गुप्ता का किया का किया आभार व्यक्त नई दिल्ली। दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) को ₹11,266 करोड़ से अधिक का फंड देने के फैसले का स्थायी समिति अध्यक्ष श्रीमती सत्या शर्मा ने स्वागत करते हुए मुख्यमंत्री श्रीमती रेखा गुप्ता के प्रति आभार व्यक्त किया है। उन्होंने इस बजट को जनहित और विकास पर केंद्रित बताते हुए कहा कि यह राजधानी के समग्र विकास को नई दिशा देगा। सत्या शर्मा ने कहा कि निगम को मिला यह वित्तीय सहयोग उसकी आर्थिक स्थिति को मजबूत करेगा और लंबे समय से लंबित देनदारियों को कम करने में मददगार साबित होगा। इससे एमसीडी अपने दायित्वों का निर्वहन अधिक प्रभावी ढंग से कर सकेगा और नागरिकों को बेहतर सेवाएं उपलब्ध होंगी। उन्होंने बताया कि इस फंड से स्वच्छता, सड़कों के रखरखाव, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं और अन्य बुनियादी सुविधाओं में सुधार आएगा। साथ ही, विभिन्न क्षेत्रों में चल रही विकास परियोजनाओं को समय पर पूरा करने और नई योजनाओं को लागू करने में भी गति मिलेगी। सत्या शर्मा ने बजट में सड़कों के निर्माण के लिए किए गए ₹1000 करोड़ के प्रावधान को भी सराहनीय बताया। उनके अनुसार, इससे सड़क व्यवस्था बेहतर होगी, यातायात सुगम बनेगा और धूल प्रदूषण को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। इसके अलावा, उन्होंने बताया कि एमसीडी के सहयोग से 5 नई आधुनिक पार्किंग सुविधाएं विकसित की जाएंगी, जिससे शहर में पार्किंग की समस्या को कम किया जा सकेगा और यातायात व्यवस्था में सुधार होगा। उन्होंने बजट में 1000 स्मार्ट टॉयलेट बनाने की घोषणा को भी अहम कदम बताया। उनके अनुसार, इससे स्वच्छता व्यवस्था मजबूत होगी, नागरिकों को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी और खुले में शौच जैसी समस्याओं पर नियंत्रण पाने में मदद मिलेगी। अंत में सत्या शर्मा ने कहा कि यह बजट दिल्ली के बुनियादी ढांचे, स्वच्छता और विकास को मजबूत करने की दिशा में एक दूरदर्शी पहल है। इसके प्रभावी क्रियान्वयन से राजधानी को स्वच्छ, सुव्यवस्थित और आधुनिक शहर बनाने का लक्ष्य हासिल किया जा सकेगा।