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नारी तू नारायणी

विधु गर्ग

भारतीय परिप्रेक्ष्य में “नारी तू नारायणी” एक वाक्यांश नहीं, अपितु एक संस्कार है। यह संस्कार अत्यंत पढ़ी-लिखी, ऊंचे पद पर कार्य करने वाली अथवा जीवन के किसी भी क्षेत्र में, अपना उत्कर्ष देने वाली नारी पर ही, लागू नहीं होता अपितु समाज के अति सामान्य और किसी भी वर्ग अथवा क्षेत्र से आने वाली नारी पर भी लागू होता है।

नारी “मां” होती है। मातृत्व से पोषण करती है। फिर चाहे वह संतान हो, परिवार हो अथवा राष्ट्र और समाज हो।

पाश्चात्य अवधारणा के विपरीत भारतीय समाज में नारी को पुरुष से बराबरी करने की आवश्यकता नहीं है। वे स्वाभाविक रूप से ही मान-सम्मान से प्रतिष्ठित है।

भारतीय समाज में स्त्री और पुरुष एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी ना होकर एक दूसरे के पूरक होते हैं। भगवान शिव का “अर्धनारीश्वर स्वरूप” इसी बात को प्रतिष्ठित करता हुआ प्रतीत होता है। स्त्री, पुरुष के साथ मिलकर संपूर्ण होती है और पुरुष, स्त्री के साथ संपूर्ण माना जाता है। स्त्री-पुरुष “समाज रूपी रथ” के दो पहिए हैं, जिन्हें “संस्कार रूपी सारथी” के माध्यम से चलाया जाता है।

पिछले 1000 वर्ष के गुलामी के दौर और आक्रांताओं के अत्याचारों के कारण , निश्चित रूप से भारतीय नारी पर भी कुछ प्रतिबंध लगे और उनके दुष्प्रभावों से अभी तक भी, मुक्त नहीं हुआ जा सका है। लेकिन मूल रूप से मान-सम्मान उसी रूप में प्रतिष्ठित है।

नारी जीवन के प्रत्येक क्षेत्र की पोषक है । जब वह अपनी संतान के पोषण के साथ-साथ , अपनी परंपराओं, रीति-रिवाजों, तीज़-त्योहारों के माध्यम से, अपनी क्षमता के अनुसार दान-दक्षिणा देती है, भेंट-उपहार देती है अथवा बर्तन-कपड़ों से लेकर स्वर्ण-आभूषणों और महंगे आधुनिक उपकरणों की खरीददारी करती है, तो वह न केवल उत्पादन को प्रोत्साहित करती है, अपितु निर्बाध “मुद्रा-संचरण” के माध्यम से “अर्थव्यवस्था” को भी पोषित करती है।

नारी “मां” के रूप में अपनी संतान की “प्रथम गुरु” होती है । जब वह नदी, वृक्ष, गऊ इत्यादि को पूजती है, तो यह समाज को पर्यावरण चेतना से जोड़ती है । शिक्षा के क्षेत्र में नारी-शक्ति का वर्चस्व स्पष्ट दृष्टिगोचर है।

नारी “मां” होने के कारण अपनी संतान की नकारात्मक दुर्बुद्धि का शमन करती है और सुबुद्धि को परिष्कृत करने का कार्य करती है। समाज में इसी भाव को विस्तारित करने के उद्देश्य से रक्षा-सुरक्षा के कार्यों में लग जाती है।

नारी-चेतना जब जागृत हो जाती है , तब मातृत्व-कर्तृत्व और नेतृत्व के माध्यम से, समाज और राष्ट्र का उत्थान निश्चित हो जाता है। इसके लिए किसी औपचारिक शिक्षा, धन-संपत्ति अथवा कोई उच्च पद की आवश्यकता नहीं होती है ।

वर्ष 1936 में मातृत्व भाव से एक-दूसरे को जोड़ने के लिए “राष्ट्र सेविका समिति” की स्थापना एक बहुत ही सामान्य नारी “लक्ष्मी बाई केलकर जी” द्वारा की गई। कर्तृत्व भाव से संगठित करते-करते “राष्ट्र सेविका समिति” को एक विशाल संगठन बना करके, “वंदनीय लक्ष्मी बाई केलकर जी” ने, संगठन की शक्ति को स्थापित किया और जीवन पर्यंत नेतृत्व करके, सुप्त पड़ी “नारी-चेतना” को जागृत किया।

“नारी” जब स्वयं और परिवार से विस्तृत होकर, समाज के लिए भी, कार्य करती है तो वह स्वत: ही “नारायणी” स्वरूपा हो जाती है ।

वर्तमान समय में जीवन के हर क्षेत्र में, भारतीय महिला बढ़-चढ़कर अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर रही है। हर क्षेत्र में हमें आज चर्चित महिलाएं दृष्टिगोचर हैं । चाहे वह खेल का मैदान हो या हिमालय की ऊंचाई, राजनीति की बिसात हो या कला की कोमलाई । उद्योग, वित्त, व्यापार, विज्ञान, तकनीक, कृषि, रक्षा-सुरक्षा इत्यादि सभी क्षेत्रों में, महिलाएं अपने योगदान को ‘मील का पत्थर’ बना रही हैं । चर्चा में रहने के कारण , नई पीढ़ी को प्रोत्साहित भी कर रही हैं । किंतु इन चर्चित विभूतियों के अतिरिक्त भी, बहुत सी महिलाएं, स्थानीय स्तर पर बहुत महत्वपूर्ण कार्य कर रही हैं।

ये महिलाएं , स्थानीय स्तर पर अपने आसपास के लोगों और समाज को प्रभावित भी कर रही हैं। पिछले कुछ वर्षों से इन महिलाओं के योगदान को पद्म पुरस्कार देकर प्रतिष्ठित किया जा रहा है। जिससे यह राष्ट्रीय स्तर पर भी, सब की प्रेरणा स्रोत बन रही हैं ।

इन पद्म पुरस्कारों से सम्मानित कुछ महिलाओं का परिचय इस प्रकार है:- त्रिपुरा की स्मृति रेखा चकमा जी हैं, जो स्थानीय पारंपरिक बुनाई पर गहन कार्य कर रही हैं ।
असम की पार्वती बरुआ जी हाथियों को प्रशिक्षण देने का कार्य करती हैं, इन्होंने वैज्ञानिक तरीके से स्थानीय स्तर पर, हाथी और मनुष्य के टकराव को रोकने में अपनी भूमिका निभाई है ।
बिहार की दुलारी देवी जी मिथिला पेंटिंग्स पर कार्य कर रही हैं ।
उड़ीसा की सरूबाई के नाम से लोकप्रिय गायिका पूर्णमासी जी हैं, जिन्होंने 50000 से अधिक भक्ति गीतों की रचना भी की है।
आंध्र प्रदेश की एन सुमंथी जी ,अपने जुनून से पहली महिला मृदंग वादिका के रूप में जानी जाती हैं।
महाराष्ट्र की सिंधुताई सपकाल जी ने 1500 से अधिक बेघर बच्चों को मां का प्यार देकर के, पालन पोषण किया है ।

यह वे कुछ गुमनाम से नाम हैं ,जो अपने कार्य के योगदान से सामान्य “नारी” को जोश-उत्साह-विश्वास की प्रेरणा से “नारायणी” स्वरूपा हो जाते हैं।

आवश्यकता इस बात की है कि, आज की आधुनिक नारी पश्चिमी विमर्श भ्रम में ना उलझे। सिगरेट, शराब लिव इन रिलेशन, बहसबाजी आदि की बराबरी के चक्कर में पड़कर अपने सम्मान को कम ना करे।

स्वतंत्रता के उपरांत भारतीय संविधान ने स्त्री पुरुष को समान अधिकार प्रदान किए हुए हैं। स्पष्ट है भारत में स्त्री अधिकारों का हनन संवैधानिक तौर पर भी एक अपराध ही माना जाएगा । अतः अपने अधिकारों को लेकर, स्त्री को भयाक्रांत रहने की कतई आवश्यकता नहीं है।

स्त्री और पुरुष के अपने-अपने प्राकृतिक गुण और संरचना होती है। यह सामान्य रूप से दिखाई भी देती है और वैज्ञानिक रूप से सत्य भी सिद्ध होती है। इसलिए स्त्री को चाहिए कि वह अपने स्वाभाविक गुणों का विकास करें , ना कि आधुनिकता की होड़ में, हर बात में पुरुष के साथ बराबरी का दंभ भरे। अपने अंदर कौशल विकास करते हुए हर स्त्री को , मातृत्व कृर्तृत्व और नेतृत्व के गुणों को आत्मसात करने के साथ , हर दिन, कुछ मिनट अथवा कुछ घंटे बिना किसी लाभ आकांक्षा के समाज के उत्थान के लिए अवश्य देने का प्रयास करना चाहिए ।

समाज और राष्ट्र उत्थान के लिए निरंतर किया गया यह सक्रिय प्रयास स्वत: ही उसे नारी से नारायणी स्वरूपा कर देगा।

वंदे मातरम्।।

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