20 साल, 300 से ज्यादा एफआईआर, फिर भी नहीं मिला न्याय

जयपुर के बड़े जमीन घोटाले में ज्ञान चंद अग्रवाल के खिलाफ नई एफआईआर, सिस्टम पर उठे सवाल
क्या ED की जांच से सैकड़ों मध्यमवर्गीय परिवारों को मिलेगा न्याय?

जयपुर। करीब दो दशक पहले शुरू हुआ कथित जमीन घोटाला आज भी चर्चा में है। 14 दिसंबर 2025 को जयपुर के मानसरोवर थाने में एक नई एफआईआर दर्ज की गई है। यह मामला ज्ञान चंद अग्रवाल और M/s Shri Salasar Overseas Pvt. Ltd. से जुड़ा है।

नई एफआईआर में कंपनी के साथ ज्ञान चंद अग्रवाल, प्रमोद कुमार अग्रवाल और बद्री के नाम शामिल हैं। मामला भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धाराओं 316(2), 336(2), 337, 338, 339, 61(2) और 3(5) के तहत दर्ज किया गया है। इन धाराओं में धोखाधड़ी, आपराधिक साजिश और विश्वासघात जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं।


क्या है आरोप?

शिकायतकर्ता के अनुसार, वर्ष 2008 में नारायण विहार, अजमेर रोड, जयपुर में 200 वर्ग गज का प्लॉट (नंबर 163) ₹5,500 प्रति वर्ग गज की दर से खरीदा गया था। 12 जून 2008 को अस्थायी अलॉटमेंट लेटर जारी किया गया। इसके अलावा विकास शुल्क के नाम पर ₹38,000 अतिरिक्त लिए गए।

आरोप है कि बाउंड्री वॉल और कमरे के निर्माण के नाम पर ₹1.5 लाख नकद भी मांगे गए। बाद में प्लॉट रद्द कर दूसरा प्लॉट (नंबर 298-D) देने की बात कही गई। पूरी राशि भुगतान करने के बावजूद न तो कब्जा दिया गया और न ही कोई स्पष्ट समाधान मिला।

शिकायतकर्ता का कहना है कि अप्रैल 2025 में साइट पर जाकर देखा गया तो वहां ऐसा कोई प्लॉट अस्तित्व में ही नहीं था। फोन पर पैसे लेने की बात स्वीकार की गई, लेकिन समस्या का समाधान नहीं किया गया।

पीड़ितों का आरोप है कि उन्हें वर्षों तक अलग-अलग बहानों और आश्वासनों के जरिए गुमराह किया गया।


20 साल से एक जैसा पैटर्न

बताया जा रहा है कि ज्ञान चंद अग्रवाल के खिलाफ जयपुर में जमीन से जुड़े ऐसे मामलों में 300 से अधिक एफआईआर दर्ज हो चुकी हैं। कई पीड़ितों ने एक समान तरीका अपनाए जाने की बात कही है—

  • प्लॉट स्कीम का प्रचार
  • अलॉटमेंट लेटर जारी करना
  • विकास शुल्क और अन्य मदों में पैसे लेना
  • प्लॉट बदलना या रद्द करना
  • बार-बार आश्वासन देना
  • न कब्जा देना, न राशि लौटाना

इन मामलों में रिटायर्ड कर्मचारी, नौकरीपेशा लोग और मध्यमवर्गीय परिवार शामिल हैं, जिन्होंने अपनी जीवन भर की कमाई जमीन खरीदने में लगाई थी।

एक पीड़ित ने कहा,
“मैंने अपनी बेटी के भविष्य के लिए प्लॉट खरीदा था। 20 साल हो गए, न जमीन मिली और न ही पैसा वापस। कई बार पुलिस के पास गया, लेकिन आज तक न्याय नहीं मिला।”


पीड़ितों की सामूहिक मांग

अब कई पीड़ित एकजुट होकर सामने आए हैं। उनका कहना है कि उन्होंने सिस्टम और दस्तावेजों पर भरोसा किया, लेकिन वर्षों से न्याय का इंतजार कर रहे हैं।

पीड़ितों की प्रमुख मांगें हैं—

  • सभी लंबित एफआईआर की तेज और पारदर्शी जांच
  • सभी मामलों को जोड़कर सामूहिक रूप से मुकदमा चलाना
  • कंपनी के लेन-देन की फोरेंसिक ऑडिट कराना
  • फास्ट-ट्रैक कोर्ट के माध्यम से समयबद्ध फैसला

ED की एंट्री: क्या आएगा मोड़?

हाल ही में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने भी इस मामले में जांच शुरू की है। बताया जा रहा है कि राजस्थान पुलिस की कई एफआईआर के आधार पर यह कार्रवाई की गई है। मामला करीब 150 करोड़ रुपये से अधिक की कथित धोखाधड़ी से जुड़ा बताया जा रहा है।

ED के अनुसार, ज्ञान चंद अग्रवाल पर जमीन हड़पने और कई लोगों व कंपनियों से करोड़ों रुपये की धोखाधड़ी करने के आरोप हैं। उन्हें राजस्थान पुलिस द्वारा हिस्ट्रीशीटर घोषित किया जा चुका है और विभिन्न अदालतों से गिरफ्तारी वारंट भी जारी हैं।

ED अब मनी लॉन्ड्रिंग और वित्तीय लेन-देन की गहन जांच कर रही है। यदि जांच में संपत्तियों की जब्ती और नीलामी की कार्रवाई होती है, तो पीड़ितों को आंशिक राहत मिलने की संभावना जताई जा रही है।


बड़ा सवाल: 20 साल तक न्याय क्यों नहीं?

सैकड़ों एफआईआर, कई गिरफ्तारियां और अदालतों में लंबित मामले—फिर भी अब तक ठोस समाधान सामने क्यों नहीं आया?

पीड़ितों का कहना है—

  • पहले दर्ज मामलों को एक साथ क्यों नहीं जोड़ा गया?
  • हर बार अलग-अलग शिकायत दर्ज कराने की नौबत क्यों आई?
  • कथित घोटाला इतने वर्षों तक कैसे चलता रहा?
  • व्यापक वित्तीय जांच पहले क्यों नहीं हुई?

कई परिवारों के लिए यह मामला अब सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था में विश्वास का प्रश्न बन गया है।

अब सबकी नजर ED की जांच और अदालत की आगामी कार्रवाई पर है। क्या इस बार 20 साल पुरानी लड़ाई को न्याय का अंत मिलेगा, यह आने वाला समय ही बताएगा।

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